Tuesday, August 25, 2009
शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार में शामिल हो
भारत को युवाओं का देश कहा जाता है। आकलन के मुताबिक देश की जनसंख्या का 54 प्रतिशत हिस्सा 35 वर्ष से कम आयु का है। यह बात इस लिहाज से देश के उज्जवल भविष्य का परिचायक मानी जाती है कि हमारे पास काम करने के लिए ज्यादा हाथ और दिमाग मौजूद हंै। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी 54 प्रतिशत में जनसंख्या का वह हिस्सा भी आता है, जिन्हें शिक्षा उपलब्ध नहीं। जिनका बचपन श्रम के बोझ तले दबा है तथा जिन्हें उनके सपनों के स्वच्छंद आकाश से वंचित रखा गया है।
क्या देश के ये नौनिहाल जिन्हें शिक्षा का बुनियादी हक भी प्राप्त नहीं है, बड़े हो कर अपने क्षेत्र में कुशलता प्राप्त कर सकेंगे। क्या इनके भीतर पल रही संपूर्ण संभावनाओं का विकास हो पाएगा। ये वे अहम सवाल हैं जो हमें देश के उज्जवल भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं होने दे सकते।
पिछले दिनों लोकसभा में मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक 2008 पारित कर दिया गया। संविधान संशोधन 2002 द्वारा एक अनुच्छेद 21(अ) संविधान से जोड़ा गया। यह अनुच्छेद राज्य को 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए अनिवार्य एवं मुफ्त शिक्षा के लिए जिम्मेदार बनाता है। जिस देश में साक्षरता दर 65 प्रतिशत हो और लगभग 30 करोड़ की आबादी निरक्षर हो उस देश के लिए संसद में पारित यह बिल काफी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन यह विडंबना ही कही जाए कि इस विधेयक पर लोकसभा में मात्र दो घंटे ही बहस हुई। राष्ट्रीय मीडिया में भी इसकी कोई विशेष चर्चा नहीं हुई। राष्ट्रीय महत्व के इस विधेयक पर छाई खामोशी वर्तमान समय में सामाजिक सरोकारों की गिरावट का ज्वलंत उदाहरण है।
जब भी शिक्षा को मौलिक अधिकार में शामिल किए जाने की बात आती है तो ये सवाल पैदा किए जाते हैं कि इतना पैसा कहां से आएगा? रूपयों के आवंटन में केंद्र या राज्य की भूमिका क्या होगी? केंद्र यह जिम्मेदारी राज्य पर डालता है तो राज्य केंद्र पर। यह भी सवाल उठाया जाता है कि क्या हमारा देश इतने बड़े पैमाने पर गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करने में सक्षम है?
जहां तक पैसों की कमी का सवाल है तो हमारे देश के पास इतना पैसा है कि इसपर होने वाले पूरे व्यय को वहन कर सकता है। अगर कुछ कमी आती भी है तो सरकार शिक्षा के मद में लगाए। हर साल अरबों रूपयों का रक्षा समझौता किया जाता है। हथियारों पर इतना खर्च करने से बेहतर है कि उन्हें शिक्षा के मद में खर्च किया जाए। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की भी बात की जाए तो केंद्रीय विद्यालय, सैनिक स्कूल, नवोदय विद्यालय जैसे बेहतर उदाहरण हमारे पास हैं। इनमें पढ़ने वाले बच्चों को तमाम सुविधाएं मिल रही हैं और ये प्राइवेट स्कूल के बच्चों को टक्कर भी दे रहे हैं। बस यह क्वालिटी एडुकेशन केंदीय कर्मचारियों जैसे कुछ चुनिंदा लोगो के लिए ना हो और शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकारों की सूची में शामिल कर लिया जाए, सरकार से जनता की यही अपेक्षा है।
स्तुति नारायण
Monday, August 17, 2009
भारतीय पूंजीवाद का साम्राज्यवादी मंजिल में प्रवेश
विचारणीय बात यह है कि पूंजीवाद की दिशा में पहली दूसरी सीढ़ियां चढ़ता हुआ भारत आज साम्राज्यवाद की मंजिल में प्रवेश कर चुका है और यह सफर उसने देश के उस बड़े समूह के सहयोग से तय किया जिनके हाथ इस विकास से कुछ भी नहीं आना था, ना आया और ना ही आगे आने वाला है। यह भी निश्चित है कि इनके सहयोग के बिना तथाकथित विकास की यह यात्रा देश के लिए न कभी संभव थी न आगे होगी। इसलिए कहा जा सकता है कि पूंजीवादी विकास की इस बहुमंजिली इमारत की नींव, दिनोंदिन बदत्तर स्थिति को प्राप्त हो रहे आम जन ही है। अब इस पक्ष को भोला कहा जाए या बेवकूफ इसके लिए इसकी भीतरी सच्चाइयों पर गहरी निगाह डालनी होगी तभी उससे पैदा हुए सवालों का हल ढूंढ़ने की दिशा में कोई सार्थक प्रयास संभव हो पाएगा।
औपनिवेशिक शासन के चक्र में फंसे भारत के तत्कालीन क्रांतिकारियों और विचारकों ने जनमानस में परिस्थितियों के प्रति जागरूकता लाकर उसी जन शक्ति की मदद से देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त करा लिया। और तब शुरू हुआ राष्ट्र को जिन नीतियों पर चलना था उसके निर्माण का क्रम। यही नीतियां देश के विकास की दिशा तय करने वाली थी। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से शासन और सत्ता को प्रभावित करने वाले या यों कहें कि इससे लाभान्वित होने वाले लोगों द्वारा जब नीतियां निर्धारित की जा रही थीं तो सामान्य जनों के हितों से जुड़े कुछ ऐसे नीति और नियम जरूर बनाए गए जो जनसामान्य की आंखों के आगे भ्रम जाल फैलाने के लिए काफी थे शिक्षा का प्रसार, निम्न जातियों का उत्थान, औद्योगिक विकास, बैंकों व वित्तीय संस्थाओं का राष्ट्रीयकरण आदि शुरू-शुरू के कुछ ऐसे मुद्दे थे जिससे आम जनता का भी सरोकार था। इससे भुलावे में आ गए आम जनों को यह नही समझ आ सका कि प्रत्यक्ष तौर पर उनके द्वारा उनके लिए बनी ये सरकार जो सुधारवादी नियम और जनकल्याण कारी योजनाएं तैयार कर रही है वह वास्तव में आगे चलकर भूस्वामियों को उद्योग और व्यापार की दिशा में ज्यादा से ज्यादा आगे बढ़ाने में ही सहायक होगा। भू एवं संसाधनों का राष्ट्रीयकरण करके राष्ट्र की भलाई के नाम पर उन हाथों में सौंपा जाएगा जिनका अर्थतंत्र एवं राजतंत्र में वर्चस्व है। इस तरह धीरे-धीरे सबकुछ ठीक होने के इंतजार में भोली जनता देश को अपनी श्रम शक्ति का सहयोग देती रही और खास समर्थ पूंजीपति वर्ग समय के साथ ज्यादा से ज्यादा संपत्तिवान और सामर्थ्यवान होता चलता गया। फिर सामान्य जन और पूंजीपति वर्ग के बीच की खाई दिनों दिन चौरी होती चली गई और अपनी बढ़ती पकड़ की बदौलत ये पूंजीपति वर्ग मेहनत कश्त आम जनता को हर स्तर पर अपनी स्थिति से समझौता करने के लिए मजबूर करता चला गया। सरकार द्वारा ऐसे बजट और नियम बनाए जाने लगे, जो टैक्स आदि के माध्यम से जनता की गाढ़ी कमाई से भरे सरकारी खजाने का मुंह इन पूंजीपतियों के लिए खोल सके। इतना ही नहीं देश की जरूरतों के नाम पर लिए गए कर्ज का लाभ तो ये पूंजीपति वर्ग उठाता लेकिन उसका बोझ मंहगाई के माध्यम से जनसामान्य के कंधों पर डाल दिया जाता।
अब सवाल यह उठता है कि सन् 1947 के पहले जिस एक मुद्दे पर संपूर्ण भारतीय जनमानस एक था कि ‘देश को अंग्रेजों से मुक्त कराना है’ वह मुद्दा ज्वलंत बने रहने के लिए किस वर्ग से सबसे अधिक शक्ति पा रहा था। या यों कहें कि देश का अंग्रेजों द्वारा दोहन किया जाना, कच्चा माल यहां से ले जाना और तैयार माल की यहां खपत करना व्यावाहारिक तौर पर जिसके लिए सबसे अधिक पीड़ादायक था, वे ज्यादा से ज्यादा जमीन पर मालिकाना हक रखने वाले लोग कहीं न कहीं से अपनी इस पीड़ा को आम मेहनतकश लोगों की देशभक्ति की भावना से जोड़कर उसका विस्तार कर रहे थे। आजादी का मुद्दा जहां गरीबी के कारण जलालत झेल रहे मजदूर, मेहनतकशों और छोटी जोत वाले किसानों के लिए उनकी रोजमर्रा की कठिनाइयों से छुटकारा पाने का सपना था वहीं बड़े जमींदारों के लिए अपनी संपत्ति, शक्ति और सामर्थ्य बढ़ाने के मार्ग को निष्कंटक करने का प्रयास। सपनों में डूबे आमजन ये नहीं समझ पाए कि आजादी के बहाने हो रहा सत्ता का यह हस्तांतरण उन्हें और भी गहरी नींद सुलाने के लिए है जिससे वे सपने भी ना देख पाएं। जो लोग वास्तविक स्थिति को समझ पा रहे थे उनकी पंूजीपतियों के आगे एक नहीं चली क्योंकि इस वर्ग को जहां औद्योगिक क्रांति बहुत पहले हो चुकी थी, उन समर्थ देशों का भीतरी सहयोग प्राप्त था, क्योंकि इनके स्वार्थ एक थे। अब नियम, कानून, सरकार सबकुछ वैसा ही होना था जो इनकी दिन दूनी रात-चैगुनी प्रगति में सहायक हो तथा सामान्य जन को भी लालच, भ्रम, उत्कोच डर आदि के सहारे इनकी दिशा और गति के अनुकूल बनाए रखे। देश के विकास का नेतृत्व करने वाला, प्रगति पथ पर अग्रसर यह पूंजीपति वर्ग प्रतिकूलताओं को दबाता तथा उसकी अनदेखी करता हुआ अब साम्राज्यवाद की मंजिल में प्रवेश कर चुका है। दुनिया के सामर्थ्यवान लोग अपने संप्रभुता संपन्न देशों की सीमा लांघकर एक मंच पर खड़े हैं लेकिन उनके बीच की प्रतिद्वंदिता बरकरार है। इनकी यह प्रतिद्वंदिता पूंजी का अधिक से अधिक केंद्रीकरण करके आर्थिक तौर पर सशक्त और समर्थ होने की है। वे विदेशी कंपनियों का हमलावर तरीके से अधिग्रहण करने और पूंजी की सुरक्षा एवं विस्तार के लिए अपनी सामरिक शक्ति को बढ़ाने में लगे हैं तथा इसके साथ ही देश के अंदर दबी और शोषित मेहनतकश जनता में असंतोष के कारण पनपने वाले आक्रोश को कुचलने के लिए पुलिसिया तंत्र और अर्द्धसैनिक बलों को भी सशक्त और मजबूत रखना चाहते हैं।
यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि जीवन में अपने स्वभाव और प्रकृति के अनुसार शक्ति और सामथ्र्य की वृद्धि तो किसी के लिए अनुचित नहीं बल्कि सहज और सामान्य है। किंतु कोई भी वृद्धि या बढ़ोत्तरी जबतक समाज के सबसे कमजोर तबके से लेकर ऊपर तक के लिए कल्याण कारी नहीं तब तक उसे उचित नहीं माना जा सकता है। किसी भी सामर्थ्यवान की प्रगति उसी मात्रा में उचित मानी जा सकती है जिस मात्रा में वह संपूर्ण समाज के लिए कल्याणकारी है। इसके उलट साम्राज्यवादी प्रतिद्वंदिता समाज के बहुसंख्यक वर्ग के आवश्यक आवश्यकताओं को पूरी करने के लिए जिम्मेदार, देश की सरकार का भी अपने विकास के लिए हथियार की तरह उपयोग कर रही है। तथा आमजन की मेहनत और श्रम की नींव पर साम्राज्यवाद की बहुमंजिली इमारत खड़ी की जा रही है। इस नींव के हिलते ही यह इमारत गिरकर ध्वस्त हो सकती है लेकिन अब यह नींव हिलेगी तब जब मेहनतकश जनता को कोई ऐसा समर्थ पक्ष मिलेगा जो पूरे समाज के वास्तविक विकास के लिए कटिबद्ध दिखाई पड़ेगा। तवे से निकलकर चूल्हे में जाने के लिए अब यह भीतरी तौर पर जागरूक हो चुका जनमानस कतई तैयार नहीं। उन्हें उनकी मानसिक शक्ति को क्रियान्वित करने के लिए एकीकृत करने वाला कोई ठोस विकल्प चाहिए, जो दिन-ब-दिन असहाय होती जा रही परिस्थितियों में इन्हीं के बीच से उभर सकता है।
प्रस्तुति --स्तुति नारायण
‘मेरे नाविक’:समीक्षा
मेरे नाविक ! धीरे-धीरे।
जिस निर्जन में सागर लहरी
अम्बर के कानों में गहरी-
निश्छल प्रेम-कथा कहती हो
तज कोलाहल की अवनीरे।
‘मेरे नाविक’ संबोधन से यह स्पष्ट है कि जिस नाव पर कवि बैठा है, वह उसकी अपनी नाव है और इस प्रकार नाविक भी उसका अपना नाविक है। नाव में डूबने से बचने का भाव है और नाविक में नाव किनारे ले जाने वाले व्यक्ति का। यह नाविक कवि की नाव किनारे ले जानेवाला उसका परम हितैषी और उसका अपना नाविक है। अपने उसी नाविक से कवि आत्मीयतापूर्ण ढंग से आग्रह करता है कि वह उसे ‘भुलावा देकर’ धीरे-धीरे वहां ले चले।
भुलावा इसी रूप में नाविक दे सकता है कि यह कवि से कहे कि नाव कहीं और नहीं किनारे जा रही है, मगर असल में जा रही हो नाव कहीं और ही। कवि के मन में किनारे जाने का आग्रह हो सकता है। नाविक को किनारे पर पहुंचा देने में ही अपने नाविक होने की सार्थकता दीख पड़ सकती है। दोनों के निवारणार्थ कवि सुझाव देता है कि किनारे ले चलने का बहाना करके ‘धीरे-धीरे’ (जिससे कवि को यह पता नहीं चले कि नाव किनारे नहीं कहीं और जा रही है) नाव वह वहां ले चले।
उस एकान्त स्थान में, जहां सागर की लहरी आकाश के कानों में गहरी और निश्छल प्रेम-कथा कह रही हो। लहरी उस निर्जन स्थान में धरती का कोलाहल छोड़कर आयी हो। सागर की लहरी किनारे को धरती से टकराकर, उसकी कठोरता से चोट खाकर ही लौट सकती है। चोट खाकर धरती को वह मर्म की बात कैसे कह सकती है? धरती अगर सुनाने योग्य न हो तो आकश ही उसकी बात सुन सकता है। आकाश इतना संवेदनशील है कि वह झुक आया है। उसने अपनी ऊंचाई छोड़ दी है। धरती ठोस है, आकाश के ठोस होने का प्रश्न नहीं उठता। लहरी स्वयं भी तरल है और उसके स्वर में भी संगीत है। इसी कारण किनारा छोड़ती लहरी वहां पहुंचती है जहां आकाश उसका ऐसा आत्मीय बन जाता है कि उसके, सिर्फ उसके कानों में वह मर्म की बात कह सकती है, कह रही होती है। (कवि स्वयं किनारे का, किनारा पाने का आकर्षण अस्वीकार नहीं करता। नौका किनारा पाने को ही चलती है। नाविक से आत्मीयता का आधार किनारा पाने का भावैक्य ही है। कवि का यह कैसा नाविक है, जो किनारे नहीं ले चलनेवाला होने के कारण ही उसका अपना नाविक है?)
जहां सांझ-सी जीवन-छाया
ढीले अपनी कोमल काया
नील नयन से ढुलकाती हो
ताराओं की पांत घनी रे।
कवि का गन्तव्य लहरी और आकाश का वह मिलन-स्थल है, जहां सांझ जैसी जीवन-छाया अपनी कोमल काया ढीली करके तारक-पंक्तियों के रूप में अविरल अश्रुपात कर रही हो। छाया धुंधली होती है, सूक्ष्म होती है, यद्यपि उसका आधार स्थूल ही होता है। छाया स्वयं कितनी भी धुंधली क्यों न हो उसकी आंखों से टपके अश्रुकण तारकों की तरह ज्योतित और बहुमूल्य हैं। ताराओं की घनी पांत से अर्थ अविरल अश्रुपात है। आंसू किसी पूर्वानुभूत वेदना की स्मृति से ही छलक सकते हैं, चाहे वे आंसू सांझ के हों अथवा जीवन की छाया के। रो लेने से जी उसी प्रकार हल्का होता है जिस प्रकार किसी आत्मीय को मन की बात कह देने से। लहरी आकाश के कानों में मर्म की बात कहकर जो हल्का करती है और जीवन की छाया सांझ की तरह रो-धो कर। इतना निर्विवाद है कि स्थिति आनंद की है, शीतलता की है। दुःख के समय सुखद स्मृतियां दुःख को बढ़ा देती हैं, सुख के समय तो वे दुःखद स्मृतियां सहज ही टल जाती हैं।
(शांति और शीतलता को उस स्थिति में कौन-सा विलक्षण विगत अभाव है, जिसकी स्मृति आंसू की लड़ियां पिरोकर वेदना का हार गूंथने को बाध्य करती हैं?)
जिस गंभीर मधुर छाया में
विश्व चित्रपट चल माया में
विभुता विभु-सी पड़े दिखाई
दुःख-सुख वाली सत्य बनी रे।
मधुरतम शीतलता के उस छाया लोक में, जहां परिवर्तनशील सृष्टि-चक्र की विशेषताओं के बीच से क्षणिकता लुप्त हो जाय और ईश्वरत्व ही जैसे सत्य बनकर प्रकट हो जाय, कवि नाविक से ले चलने को कहता है। धरती का सबकुछ कवि को सह्य है। दुःख-सुख, रूदन-हास सबको जैसे उस छाया-लोक में वह खींच ले जाना चाहता है। इन सब में ईश्वरत्व भी मधुर क्यों न हो, होगी वह छाया ही। विश्व कितना भी आकर्षक क्यों न हो उसमें वह मधुरता नहीं आ सकती जिसकी आकांक्षा कवि ने की है।
(ईश्वरीय विभूति के जिस सत्य रूप का साक्षात्कार वह छाया-लोक में करना चाहता है उससे इस विश्व के विभूषित होने की परिकल्पना में अवरोध क्या है?)
श्रम-विश्राम क्षितिज-वेला से
जहां सृजन करते मेला से,
अमर जागरण उषा नयन से,
बिखराती हो ज्योती धनी रे।
आकाश और सागर-लहरी के परस्पर सुख-स्पर्श सम्मिलन की तरह जहां श्रम और विश्राम का स्नेह-संतुलन दीखे, वह है कवि का लक्ष्य-स्थल। सागर-लहरी में श्रम जैसी उत्सुकता, उत्फुल्लता, सहज उत्साह इत्यादि और आकाश में विश्राम की नीरवता और शान्ति। दोनों के सम्मिलन से तज्जनित पुलक-स्पन्दन की सृष्टि। शून्य और स्वर के संतुलन, क्लान्ति और विश्रान्ति के एकात्मभाव की शुभ-सृष्टि जहां हो चुकी हो, वहां उषा अपनी आंखों से घनी ज्योति की वृष्टि करती जैसे प्रकट हो।
उषा प्रकाश के आविर्भाव की प्रतीक है। प्रकाश से अंधकार का तिरोभाव लक्षित होता है। उषा केवल प्रकाश विकीर्ण नहीं करती, अमर-जागरण की स्वर्गिक चेतना भी साथ लाती है, जिससे प्रकाश की तीक्ष्णता जैसे कम हो जाती है। सृजन की बेला में अंधकार के विनाश का भाव खण्डित हो जाता है। बच जाता है जागरण, जिसकी व्याप्ति अंधकार तक होती है। जागरण अमर हो जाता है। प्रकाश और अंधकार की सीमा रेखा जहां मिट जाती है, वहां शाश्वत चेतना अमर ज्योति के रूप में सृष्टि का श्रृंगार बन जाती है।
प्रस्तुति --डाॅ रमेश नारायण
Thursday, August 13, 2009
विवादों में हिन्दी अकादमी

Tuesday, May 26, 2009
Saturday, May 9, 2009
आज हिमालय से गंगा को स्वयं उतरना होगा ...
शब्दों में ढलना होगा
आज हिमालय से गंगा को
स्वयं उतरना होगा
भाव भरे शब्दों को हिमवत
आज पिघलना होगा
प्रेमपुंज को शीतल धारा
बनकर बहना होगा
आज हिमालय से गंगा को ......
बिगडे भटके पौरुष को
भावों में बधना होगा
चंचल सजग सहज नयनो को
सागर बनना होगा
इस सागर में डूब पुरूष को
पार उतरना होगा
और जगत में प्रेम सुधा फ़िर
निसृत करना होगा
उत्तम सर्जन से जगती को
पावन करना होगा
आज हिमालय से गंगा को ...
भावों की निर्झरनी को
आंखों से झरना होगा
श्रधा और समर्पण से
मानस को भरना होगा
प्रेम तत्व को आज जगत की
तृष्णा हरना होगा
सृजन और संहार बीच कुछ
अद्भुत करना होगा
आज हिमालय से गंगा को
स्वयं उतरना होगा
अनगढ़ उलझे भावों को
शब्दों में ढलना होगा
स्तुति नारायण
Wednesday, May 6, 2009
आसमा पैरों तले आते हैं
तो पैर निकल आते हैं
जिन्दगी के उसूल कुछ ऐसे ही हैं
बनना चाहो जो परिंदा
तो शाख छूट जाती हैं ,
गर तलाश पूरी हो दिल की
जमाने में,
शाखाएँ मुट्ठी में औ
आसमा पैरों तले आते हैं
स्तुति नारायण
Wednesday, January 28, 2009
तड़प -तड़प मन बोल रहा...
तडप -तडप मन बोल रहा है
प्रियतम मेरे आ जाओ
जीना पल-पल कठिन हुआ है
थोडी आस दिला जाओ
आश्वासन दे कर ही ख़ुद को
जीवन पथ पर बढती हूँ
यादों में ही तुम्हे देख कर
दुनिया के संग चलती हूँ
आज थका मन बिखर रहा है
बांहों में सिमटा जाओ
तड़प -तड़प मन बोल रहा है
प्रियतम मेरे आ जाओ
जीना पल -पल कठिन हुआ है
थोडी आस दिला जाओ
मन के पार घने वट हो तुम
प्रेम बेल मैं लिपटी हूँ ,
कलियाँ फूल चटकते उनपर
खुशबू से मन भरती हूँ ,
आज लुटा है मन का सौरभ
बन परागकण छा जाओ
तड़प- तड़प मन बोल रहा है
प्रियतम मेरे आ जाओ,
जीना पल-पल कठिन हुआ है
थोडी आस दिला जाओ
एक घूंट अमृत का पीकर
विश्व ह्रदय में प्रेम भरू,
तुम्हे स्वयम में जी कर पलभर
दुनिया की तृष्णा हर लूँ ,
आज जला मन प्राण तृषा से
बन अमृत धार नहला जाओ
तडप -तड़प मन बोल रहा ....
स्तुति नारायण
Saturday, January 24, 2009
" कविता मैं स्वांत : सुखाय लिखता हूँ "

---- स्तुति
कविता लिखना कब शुरू किया ? आपकी पहली कविता का विषय क्या था ? किस पत्रिका में छपी ?
कुछ ठीक से याद नही ,१९८४ से लिखना शुरु कर दिया था उस वक्त मुख्यत : देश भक्ति वाली कवितायें लिखी पहली कविता 'दैनिक प्रभात 'में १९९६ में छपी थी इसका शीर्षक था 'तुम '
आप क्यों लिखते हैं ?
कविता मैं स्वांत : सुखाय लिखता हूँ मेरे अपने संतोष के लिए
रचना प्रक्रिया के विषय में बताएं
जब कभी दुनिया की आप-धापी और भीड़ -bhad से ख़ुद को अलग करने का मौका मिलता है तो दिल की बेचैनी अंतर्जगत में आकर लेने लगती है
वस्तु और शिल्प में किसे प्रमुखता देते हैं ?
मैं वस्तु को प्रमुख मानता हूँ
कविता की भाषा कैसी होनी चाहिए ?
कविता की भाषा कविता के kendriy bhaw को spasht और sahaj dhang से sampreshit करने वाली होनी चाहिए
आपको क्या लगता है किन khasiyton की wajah से yuwaon के एक बहुत bare warg द्वारा aapki कविता पसंद की jati है
जिस gramy और kasbai jiwan को जिया है ,मेरा bhawjagat उसी के anurup है यहाँ प्रेम sambndhon me आज भी bhawnayen प्रबल हैं प्रेम को sampreshit करने के tarike भी shahron से अलग है inhi bhawon की सहज सरल abhiwykti को लोगों ने swikar कर लिया ,बस
कहा जा रहा है कि कविता दिन-ब-दिन दुरूह होती जा रही है ,जिससे आम लोग इससे जुर नही पा रहे हैं आपका क्या मानना है
ने 'मुक्त छंद' की बात की ,जो भाव की व्यापक अभिव्यक्ति के लिए था, कहीं से भी कविता के भीतरी लय को बाधित करने के लिए नहीं था लेकिन आगे चलकर इसे ही छंद मुक्त करते हुए बिलकुल गद्यात्मक स्वरूप प्रदान कर दिया गया और लाय्विहिनता की ओर बढती हुई कविता दुरूह होती चली गई
क्या लेखन को आप सामाजिक दायित्व मानते हैं ?
अगर सामाजिक दायित्व या किसी भी तरह की प्रतिबद्धता रचनाकार पर ऊपर से थोपी जाये तो कविता पोस्टर या प्रचार बनकर रह जायेगी स्वत:स्फूर्त अभिव्यक्ति ही 'परिस्थिति चक्र में खो चुके मनुष्य के अन्दर के देवत्व को जगा सकती है
लेखन के कारण क्या आपको व्यक्तिगत जीवन में कभी किसी संघर्ष का सामना करना पड़ा?
(थोडा हस्ते हुए )जिनका कहन अलग होता है ,उन्हें भी रहन दुनिया के हिसाब से ही रखना पड़ता है इसलिए संघर्ष तो होगा ही यही रचनाकार के स्वप्न जगत और यथास्थिति के बीच का संघर्ष है ,जिससे कविता जन्म लेती है
कविता की आलोचना और आलोचकों के बारे में आपकी क्या राय है ?आलोचना srijanaparak न रहने दे कर व्यक्तिपरक बना दिया गया है ,जो मेरे हिसाब से आलोचना विधा के विकास में बाधक है
प्रेम की अवधारणा क्या है ?
आत्मतत्व का विस्तार ही जीवन है, इसलिए प्रेम जीवन का केन्द्रीय भाव है मानवता ,राष्ट्रीयता ,वात्सल्य ,भक्ति अनेक रूपों में यह हमारे जीवन में रहता है और समय तथा परिस्थिति के हिसाब से इसका स्वरूप हमारे ही अन्दर बदलता रहता है
स्तुति नारायण
सब एडिटर ,सीनियर इंडिया
Monday, January 19, 2009
ईश्वर साथ है...
पंख लगे अरमानो में ,
धरती छोड़ने की तमन्ना रंग लाई,
रोक नही सकते मुझे दीवार, chhat, पेड़, पहाड़
और नजरों की चुभन ,
बाल भी बांका नही कर सकता
इंसानी मन ,
क्योंकि इन्सान ही वह हैवान है
जिसने तोडे हैं कई -कई अरमानो के पंख,
बनाने को और भी चटकीले
अपने सपनो के रंग
अब और नही कर सकता ये
मेरे अरमानो के साथ छेड़खानी ,
क्योंकि मेरे सपनो में भर देने के लिए
इन्द्रधनुष के सातों रंग ,
मेरा ईश्वर मेरे साथ है ,
ऐसा है मेरा अपना विश्वास
स्तुति नारायण
सब एडिटर ,सीनियर इंडिया
Wednesday, December 31, 2008
तुम्हारी बंद आंखों में
मेरी तस्वीर लहराए
थिरकता चाँद झीलों में
धवल उजियार फैलाये
सुधा की धार बह जाए
ह्रदय का तार छू जाए
kamldahझील में उजली किरण
श्रृंगार कर जाए
तुम्हारी बंद आंखों में ...
ह्रदय की रागिनी में प्रेम का
सुरताल मिल जाए
निकलकर झील से शुभ्रा
सुरों में सोमरस घोले
तेरी मैं हो चुकी कब से
निठुर अब तू मेरा हो ले
तुम्हारी बंद ......
ह्रदय की उर्मियों पर चांदनी
विस्तार पा जाए
जगत की चेतना में वेदना
निज सार पा जाए
तेरी पलकों के उठते ही
मेरी सूरत नजर आए
तुम्हारी बंद आँखों में
मेरी तस्वीर लहराए
स्तुति नारायण
Wednesday, November 26, 2008
सच्ची कहानी
निराली सी इक बात सच्ची कहानी
कहती थी जो मुझको बचपन में नानी
समझती थी जब मैं उसको कहानी
लेकिन न समझी थी तब उसका मानी
वह सच्ची कहानी नहीं थी कहानी
हमारी तुम्हारी ही थी जिंदगानी
स्तुति नारायण
सब एडिटर (सीनियर इंडिया )
Friday, November 21, 2008
सबेरा
सम्भल जाओ कि सफ़र लम्बा है
एक छोटा पत्थर दे सकता है जख्म गहरा ,
पावों तले आ कर गिरा सकता है तुम्हे मुंह के बल ,
उठकर खडा भर हो जाना काफी नहीं होगा ,
क्योंकि तुम्हे तो अभी जाना है चीरकर कुहासा
वहां तक ,
जहाँ से खींच लानी है वह रौशनी ,
जो दूर कर सके
दीपक तले का अँधेरा ,
तब जा कर होगा तुम्हारा सबेरा
स्तुति रानी
सब एडिटर (सीनियर इंडिया )
Wednesday, November 5, 2008
प्रणय-बंध
स्वर्ण कलश ले उषा सुंदरी
का जग को नहलाना ,
प्रथम रश्मि का नेह नलिन को
हौले से छू जाना ,
प्रणय -बंध में मुक्त किरण का
औचक ही बंध जाना ,
जग के सिरजनहार आदि कवि
का लेखनी उठाना ,
रासेशवर का ब्रज गोपिन संग
ब्रज में रास रचाना,
विरह अग्नि की ज्वाला में
ब्रजवासी को झुलसाना,
ऐसा उसका दृश्य प्रकृति में
अपने को दर्शाना ,
शुष्क तपोवन में अमृत की
धारा बन बह जाना
स्तुति रानी
सब एडिटर , सीनियरइंडिया (मैगजिन)
Friday, October 31, 2008
प्रीति स्पर्श
मै पार जाना चाहता हूँ
आँख देखी दूरियों का भूलना,
पास् की परछाइयों पर झूलना
साँस की भटकन सिहरकर थामना ,
आँख आंखों में सजल शुभकामना
एक दुबली-सी किरण की आहटों पर
धुंध को अकवार लेना चाहता हूँ
बड़ी पलकें मौन हो -हो बोलतीं
नेह-नलिनी नयन-पंखुडी खोलती
अतल तल में एक कुहरा जागता,
सजग मिठी आस को पहचानता
आँसुऒं के मोल बिकना जानता
द्वार बैठे पहरुओं की टोह लेकर ,
अबूझे सब भेद लेना चाहता हूँ
मै समुंदर पार जाना चाहता हूँ ...........
डॉ. रमेश नारायण
पूर्व यूनिवर्सिटी प्रोफेसर ,पटना (बिहार)

